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देवी दश श्लोकी स्तुति
Devi Dasha Sloki Stuti
Devi Dasha Sloki Stuti
Text in देवनागरी script
Devotional text
देवी दशलोकीतुती
{॥ देवी दशलोकीतुती ॥}
चेटी भव िनिखल खेटी कदंबवन-वाटीषु नािकपटली
कोटीर चातर-कोटी मणीिकरण-कोटी करंिबत पदा ।
पाटीर गिध कुचशाटी किवव पिरपाटी-अगािधप सुता
घोटी खुरादिधक धाटी उदार मुख वीटी रसेन तनुता ॥ १
चेटी भव िनिखल खेटी =
करंिबत पदा =
मणीिकरण-कोटी =
कोटीर चातर-कोटी =
नािक-पटली = a
पाटीर-गिध = -
कुच-शाटी = - ( )
घोटी-खुरा अिधक धाटी = A
मुख-वीटी रसेन तनुता =
ैपायन भृित शापायुध ििदव सोपान धूिल चरणा
पापापह वमनु-जापानुलीन-जन तापापनोद िनपुणा ।
नीपालया सुरिभ धूपालका दुिरतकूपा-उदंचयतु मा
पािधका िशखिर भूपाल वंश मिणदीपाियता भगवती ॥ २
धूिळ चरणा =
ििदव सोपान =
ैपायन-भृित शापायुध =
पापापहव =
ताप अपनोद िनपुणा = O
मनु-जाप-अनुलीन जन =
नीपालया = O !
सुरिभ धूप अलका =
दुिरत-कूपा उदंचयतु मा = /
पािधका = O !
िशखिर-भूपाल वशमिण-दीपाियता = (
आळीिभर्-आत तनुराळी लस िय कपोळीषु खेलित भव
याळी नकुयिसत चूळी भरा चरण धूळी लस-मुिनगणा ।
आळी-भृत विस ताळी-दल वहित याळीक शोिभ ितलका
साळी करोतु मम काळी मनः वपद नाळीक सेवन िवधौ ॥ ३
आळी =
भव-याळी नकुली = -
अिसत चूळी भरा =
चरण धूळी लस-मुिनगणा =
आळी-भृत विस = - -
ताळी-दळ वहित ता = a -
अलीक शोिभ ितलका = a
सा काळी आळी करोतु मम मनः =
व-पद नाळीक सेवन िवधौ = -
काळी मम मनः शाली करोतु =
वपद-नालीक-सेवन-िवधौ =
बालामृतांशु-िनभ-फाला मना-अण चेला िनतंब फलके
कोलाहल िपत कालामराकुशल कीलाल शोषण रिवः ।
थूला कुचे जलद नीला कचे किलत वीला कदंब िविपने
शूलायुध णत शीला िवधातु िद शैलािध-राज-तनया ॥ ४
कंबावतीव स िवडंबा गलेन नव तुंबाग वीण सिवधा
बबाधरा िवनत शंबायुधािद िनकुंबा कदंब िविपने ।
अंबा कुरग मद जताळ रोिचिरह लंबालका िदशतु मे
श बाहुलेय शिश बब अिभराम मुख संबािधत तन भरा ॥ ५
दासायमान सुमहासा कदंबवन वासा कुसुंभ सुमनो
वासा िवपिच कृत रासा िवधूत मधु मासारवद मधुरा ।
कासार सून तित भास अिभराम तनुर् आसार शीत कणा
नासा मिण वर भासा िशवा ितिमरमासाये-उपरित ॥ ६
पकाकरे वपुिष ककाल रत पुिष ककािद पि िवषये
वं कामना-अयिस िक कारण दय पंकािर मे िह िगिरजा ।
शंका िशला िनिशत टकायमान पद संकाशमान सुमनो
झंकािर भृंग तित-अकानुपेत शिश संकाश व कमला ॥ ७
जंभािर कुंिभ पृथु कुंभापहािस कुच संभाय हार ितलका
रंभा कर कर दंभापहो गित डभा अनुरंिजत पदा ।
शंभा उदार पिररंभाकुरा पुलक दंभानुराग िपशुना
श भासुर आभरण गुंफा सदा िदशतु शुंभासुर हरणा ॥ ८
दाायणी दनुज िशा िवधौ िवतत दीा मनोहर गुणा
िभािशनो नटन वीा िवनोद मुख दावर हरणा ।
वीा िवधेिह मिय दा वकीय जन पा िवप िवमुखी
येश सेिवत िनराेप शत जय लयावधान कलना ॥ ९
दाायणी =
िवतत दीा =
दनुज-िशा-िवधौ =
मनोहर गुणा =
वीा िवनोद मुख =
िभा अिशनः नटन = - ,
दा वीा िवधेिह मिय =
वकीय-जन-पा =
िवप िवमुखी =
िनराेप शत =
येश सेिवत = , ,
जय लय अवधान कलना =
वंदा लोक वर संधाियनी िवमल कुंदावदात रदना
बृंदा-बृंद मिण-बृंदारवद मकरंदािभिषत चरणा ।
मंदािनला किलत मंदार दामिभर्-अमंदािभराम मकुटा
मंदािकनी जवन भदान वाच-अरवदानना िदशतु मे ॥ १०
याशयो गलित तागजा भवतु कुािप िनतुल शुका
सुाम काल मुख सासन कर सुाण कािर चरणा ।
छािनलािप रय पािभराम गुण िमामरी सम वधूः
कु ास हीन मिण िचाकृित फुिरत पुािद दान िनपुणा ॥ ११
कूलाित गािम भय तूला विल वलन कीला िनज तुित िवधा
कोला हल िपत काला अमरी कुशल कीलाल पोषण रता ।
थूला कुचे जलद नीला कचे किलत लीला कदंब िविपने
शूलायुध णित शीला िवभातु िद शैलािधराज-तनया ॥ १२
इंधान कीर मिणबंधा भवे दय-बंधावतीव रिसका
संधावती भुवन संधारणेऽयमृत सधावुदार िनलया ।
गंधानुभाव मुहुरंधािल पीत कच बंधा समपयतु मे
श धाम भानुमिप ंधानमाशु पद संधानमयनुगता ॥ १३
- एताव गीयते कयते -
अव धािट ,About this stotram — Durga
A Stotram is a Sanskrit hymn of praise composed by great sages and poet-saints such as Adi Shankaracharya. Stotrams describe the deity’s form, qualities and deeds in richly poetic language, and chanting them is said to purify the intellect and awaken devotion. Many stotrams carry a phala-shruti — a closing verse describing the benefits of recitation.
How to chant
Stotrams reward slow, attentive chanting. Read the meaning once before you begin so the verses resonate as you recite. Early morning (Brahma Muhurat) is ideal, but any quiet time works. If Sanskrit feels difficult, chant along with the transliteration and let the rhythm settle naturally over a few days of practice.
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